करनाल अनाज मंडी में गेटपास के लिए ट्रैक्टर ट्राली लेकर आता किसान।
करनाल की मंडियों में धान खरीद के दौरान बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया। जांच में खुलासा हुआ कि निजी कंप्यूटरों से फर्जी गेटपास काटकर धान की आवक कागजों में दिखा दी गई। इसके बाद सीएम ने तुरंत एक्शन लेते हुए तीन अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया। वहीं, किसान संगठ
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करनाल की मंडियों में फर्जीवाड़े की परतें खुलने के बाद मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने तुरंत कार्रवाई की। जांच में सामने आया कि हरियाणा की मंडियों में फर्जी गेटपास कटे। फर्जी गेटपास निजी कंप्यूटरों से काटे गए, जबकि मार्केट कमेटी के स्वीकृत कंप्यूटरों का इस्तेमाल नहीं हुआ। जब सिस्टम की जांच हुई, तो गड़बड़ी सामने आ गई। इसके बाद मंडी सुपरवाइजर हरदीप, अश्वनी और ऑक्शन रिकॉर्डर सतबीर को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया गया। हालांकि, मार्केट कमेटी के सहायक सचिव योगेश कुमार शर्मा ने सुपरवाइजर अश्वनी के पक्ष में बयान देते हुए कहा कि वह बेहद ईमानदार अधिकारी हैं और उनकी ड्यूटी भी कुछ ही दिनों के लिए लगी थी। उन्होंने कहा कि मुझे नहीं लगता कि अश्वनी ने कोई फर्जी गेटपास काटा है, लेकिन सीएम साहब ने जो फैसला लिया है, वह जरूर जांच के बाद ही लिया होगा।
मंडी में गेटपास काटने को लेकर होता किसानों व मंडी अधिकारियों के बीच विवाद।
भाकियू ने बताया फर्जीवाड़े का पूरा तरीका
भाकियू के प्रदेश अध्यक्ष रतनमान ने मंडियों में चल रहे फर्जी खेल का पूरा तरीका बताया। उन्होंने कहा कि यह कोई नया मामला नहीं है बल्कि हर सीजन में करोड़ों का फर्जीवाड़ा किया जाता है। उनकी माने तो इस पूरे गिरोह में आढ़ती, किसान, मार्केटिंग बोर्ड के कर्मचारी और मंडी के अधिकारी शामिल होते हैं। रतनमान के अनुसार, कृषि विभाग ने प्रति एकड़ 35 क्विंटल का पोर्टल बना रखा है, जबकि असली उत्पादन 17 से 19 क्विंटल प्रति एकड़ ही है। ऐसे में पोर्टल पर बची हुई 16-17 क्विंटल की जगह को फर्जी धान दिखाकर भर दिया जाता है। कई जगह बारीकी धान की जगह पीआर किस्म का पोर्टल कर दिया जाता है, जिससे रिकॉर्ड में धान की आवक ज्यादा दिखाई जाती है। दूसरे प्रदेशों से सस्ते दामों पर धान खरीदी जाती है या फिर हरियाणा के किसानों से कम रेट पर धान ली जाती है। फिर उसे सरकारी रेट पर पोर्टल पर दिखाकर सरकार को बेच दिया जाता है। इसी कारण मंडियों में रिकॉर्ड तोड़ आवक दिखाई जा रही है।
एक लाख क्विंटल धान के दो हजार गेटपास
नई अनाज मंडी में मार्केट कमेटी के तीन अधिकारियों और कर्मचारियों ने मिलीभगत कर करीब एक लाख क्विंटल धान के करीब दो हजार से ज्यादा फर्जी गेट पास काट दिए। ये फर्जी गेट पास असली किसानों के नाम पर नहीं, बल्कि फर्जी खातों या अन्य लोगों के नाम से तैयार किए जा रहे थे, जिससे सरकारी खरीद रिकॉर्ड में हेरफेर की गई । खास बात ये है कि ये सभी फर्जी गेट पास मंडी के गेट से नहीं बल्कि मंडी के बाहर बैठकर काटे गए हैं। इसके लिए तीनों निलंबित अधिकारियों ने अपने ही यूजर आईडी ओर पासवर्ड का इस्तेमाल तो किया लेकिन इस्तेमाल के लिए डिवाइस दूसरी ले ली।
मंडी के गेट पर नंबर 1 पर रखा गया गेटपास काटने के लिए कंप्यूटर।
मामले की शिकायत होने पर गेट पास काटने वाली डिवाइसों की जांच की गई तो उनका आईपी एड्रेस अलग अलग लोकेशन का आया। इतना ही नहीं चर्चा में ये भी हैं कि इनकी यूजर आईडी और पासवर्ड एक साथ कई कई लोकेशन पर इस्तेमाल हो रहे थे। यानी इस मामले में इनके अलावा भी अन्य कई लोग शामिल रहे हैं। जिन्हें इन तीनों के यूजर आईडी और पासवर्ड की जानकारी थी। इस मामले की जांच अब मार्केट कमेटी के मुख्य अधिकारियों से लेकर तरावड़ी अनाज मंडी तक जाएगी। संशय है कि तरावड़ी अनाज मंडी के अधिकारी भी इस खेल में शामिल रहे हैं।
फर्जी पोर्टल और गेटपास से चलता है पूरा नेटवर्क
रतनमान ने बताया कि इस फर्जीवाड़े में फर्जी पोर्टल का इस्तेमाल किया जाता है। गेटपास कटने के लिए फर्जी आईपी एड्रेस का उपयोग होता है ताकि सरकारी सिस्टम में पकड़े न जा सकें। सरकारी कंप्यूटरों के बजाय निजी सिस्टम से गेटपास काटे जाते हैं, जिससे पहचान मुश्किल हो जाती है और बाद में सब एडजस्ट कर दिया जाता है। यह कोई छोटा खेल नहीं है, बल्कि संगठित नेटवर्क के जरिए किया जाता है। मंडियों में जब धान की बोली लगाई जाती है तो एच रजिस्टर में खरीददारों की जानकारी दर्ज होती है, लेकिन कर्मचारी इसे मौके पर भरने की बजाय मनमाने ढंग से भर देते हैं। यही वजह है कि कई बार अच्छी क्वालिटी की धान की बोली 2500 से 2600 रुपये प्रति क्विंटल तक चली जाती है, जबकि सरकारी खरीद 300 रुपये कम रेट पर होती है।
गेटपास को लेकर मंडी में विवाद करते किसान।
कागजों में ही पैदा हो रही है धान
रतनमान ने खुलासा किया कि अब तो धान कागजों में ही पैदा हो रही है। यानी मंडियों में धान आई भी नहीं, लेकिन जे-फॉर्म काट दिए गए और पेमेंट भी कर दी गई। जो किसान इस गिरोह का हिस्सा हैं, उनके खातों में पैसा पहुंच गया। सूत्रों के अनुसार, इस फर्जीवाड़े में हर लेन-देन में हिस्सा तय होता है – 70 रुपये सेक्रेटरी के, 40-50 रुपये किसान के, जबकि आढ़ती को आढ़त बच जाती है क्योंकि असली धान आई ही नहीं। इस फर्जीवाड़े से सरकार को करोड़ों का नुकसान हुआ है। सूत्रों की मानें तो करनाल मंडी में करीब 5 लाख क्विंटल धान के फर्जी पर्चे काटे गए। यदि इस मात्रा को सरकारी रेट 2389 रुपये से गुणा किया जाए, तो करोड़ों का घोटाला सामने आता है।
ट्रांसपोर्ट और बिलों पर भी उठे सवाल
फर्जी गेटपास और पर्चों के साथ ट्रांसपोर्टेशन की भी एंट्री की गई। सूत्रों का कहना है कि जब कागजों में ही धान मंडी से निकली है, तो उसके ट्रांसपोर्ट बिल भी जरूर बने होंगे। सवाल यह है कि उन वाहनों के नंबर क्या हैं, उनका वीडियो रिकॉर्ड क्यों नहीं है? रतनमान का कहना है कि जब तक इन वाहनों और मिलों की पूरी जांच नहीं होगी, तब तक सच्चाई सामने नहीं आएगी।
घोटाले की जानकारी देते भाकियू प्रदेश अध्यक्ष रतनमान।
करनाल की मंडियों में पहले भी हो चुका है घोटाला
भाकियू प्रदेश अध्यक्ष ने यह भी कहा कि करनाल की मंडियों में यह पहला घोटाला नहीं है। मार्केट कमेटी की मौजूदा सचिव आशा पहले भी करनाल में पद पर रही हैं और उस समय भी फर्जीवाड़े का मामला सामने आया था, जिसमें उन्हें सस्पेंड किया गया था। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार हर बार कुछ कर्मचारियों को सस्पेंड कर मामले को दबा देती है। लेकिन इस बार आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज होनी चाहिए और जिन मिलों में धान पहुंचाई गई है, वहां का फिजिकल वेरिफिकेशन जरूरी है।
रतनमान बोले -आढ़ती और अधिकारी दोनों की मिलीभगत
यह खेल अकेले किसी क्लर्क या सुपरवाइजर का नहीं है। इसमें आढ़ती, मंडी कर्मचारी और अधिकारी सब शामिल हैं। धान का उत्पादन दिखाने के लिए कागजों में हेराफेरी की जाती है, जिससे न केवल सरकारी खजाने को नुकसान होता है, बल्कि असली किसान को उसका हक नहीं मिल पाता।
मान ने कहा कि मंडियां इसलिए चॉक हो रही हैं क्योंकि उठान नहीं हो पा रहा। जब तक आउटर गेटपास नहीं कटता, तब तक नया उठान संभव नहीं। सरकार को चाहिए कि हर मंडी का फिजिकल वेरिफिकेशन तत्काल करे।
सरकार का बड़ा एक्शन: फिजिकल वेरिफिकेशन के आदेश
इस पूरे मामले के बाद उपायुक्त उत्तम सिंह ने सभी एसडीएम को आदेश जारी किए हैं कि अपने-अपने क्षेत्र में आने वाली मिलों का फिजिकल वेरिफिकेशन किया जाए। डीसी ने कहा कि खरीदी गई धान के स्टॉक की वास्तविक मात्रा की जांच की जाए और मिल रिकॉर्ड – जैसे कि खरीद, मिलिंग, डिस्पैच लॉग – की समीक्षा की जाए। उन्होंने कहा कि अगर किसी भी मिल में स्टॉक में गड़बड़ी पाई जाती है, तो संबंधित अधिकारियों को तस्वीरों और दस्तावेजों के साथ रिपोर्ट तुरंत उपायुक्त कार्यालय में जमा करनी होगी।” इस काम में राजस्व अधिकारी, खाद्य निरीक्षक और संबंधित विभागों के अधिकारी शामिल होंगे।
मंडी में धान की एंट्री को लेकर गेटपास के लिए हाथ जोड़ता किसान।
जिले में 9.50 लाख मीट्रिक टन धान की आवक दर्ज
सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, अब तक करनाल जिले की विभिन्न मंडियों में 9 लाख 50 हजार 497 मीट्रिक टन धान की आवक दर्ज की गई है। इसमें से खाद्य आपूर्ति विभाग ने 6,37,876 मीट्रिक टन, हैफेड ने 1,89,618 मीट्रिक टन और हरियाणा वेयरहाउसिंग कॉरपोरेशन ने 1,23,003 मीट्रिक टन धान खरीदी है। डीसी ने आदेश दिए हैं कि मंडियों से धान का उठान समय पर हो ताकि मंडियां खाली हो सकें और नई आवक सुचारू रूप से जारी रहे।
भाकियू ने उठाई फिजिकल जांच और एफआईआर की मांग
भाकियू ने मांग की है कि अब सिर्फ सस्पेंड नहीं बल्कि एफआईआर दर्ज की जाए। मंडियों और मिलों में रखे स्टॉक की जांच हो, ताकि असली जिम्मेदारों तक कार्रवाई पहुंचे। संगठन ने कहा कि जब तक पूरी जांच नहीं होती, तब तक फर्जीवाड़े का असली चेहरा सामने नहीं आएगा।
सवाल वही – कितनी धान आई, कितनी गई और कहां पहुंची?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि मंडियों में जो रिकॉर्ड दिखाई दे रहा है, क्या वास्तव में उतनी धान आई भी थी? अगर नहीं, तो सरकारी खाते में दर्ज लाखों क्विंटल धान कहां से आई और कहां गई? और उस पर हुए पेमेंट के पीछे कौन-कौन से हाथ हैं? फर्जी गेटपास, निजी कंप्यूटर, नकली पोर्टल और संगठित गिरोह का यह खेल अब पूरे हरियाणा में जांच का विषय बन चुका है। करनाल, घरौंडा और तरावड़ी मंडियों में जो रिकॉर्ड तोड़ आवक दर्ज की जा रही है, वह इस बात का संकेत है कि मंडियों में खेल केवल धान का नहीं, बल्कि करोड़ों की सरकारी रकम का है।