मशरूम की खेती करके गृहिणी बनी सफल किसान उद्यमी, जानिए सीतामढ़ी के अमृता की कहानी

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अमृता देवी बताती हैं कि शुरुआत में वे बाहर से मशरूम मंगाकर दुकान पर बेचती थीं, लेकिन इसमें मुनाफा काफी कम होता था. इसी दौरान उन्होंने जीविका समूह से मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण लिया और खुद मशरूम उगाने का निर्णय लिया. यही फैसला उनके जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ.

सीतामढ़ी: बिहार के सीतामढ़ी जिले के परिहार की रहने वाली अमृता देवी ने यह साबित कर दिया है कि अगर हौसला मजबूत हो, मेहनत करने का जज्बा हो और सही दिशा मिल जाए, तो एक साधारण गृहणी भी सफल किसान उद्यमी बन सकती है. एक समय ऐसा था जब पति की दैनिक मजदूरी से परिवार का खर्च चलाना मुश्किल हो जाता था, लेकिन आज मशरूम की खेती ने अमृता देवी के जीवन को नई पहचान और आत्मनिर्भरता दी है. पिछले दो वर्षों से वे लगातार मशरूम उत्पादन कर रही हैं और अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत कर रही हैं.

अमृता देवी बताती हैं कि शुरुआत में वे बाहर से मशरूम मंगाकर दुकान पर बेचती थीं, लेकिन इसमें मुनाफा काफी कम होता था. इसी दौरान उन्होंने जीविका समूह से मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण लिया और खुद मशरूम उगाने का निर्णय लिया. यही फैसला उनके जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ. हालांकि मशरूम की खेती की शुरुआत उनके लिए आसान नहीं थी. सीमित संसाधन, घरेलू जिम्मेदारियां और आर्थिक दबाव उनके सामने बड़ी चुनौतियां बनकर खड़े थे.

इन तमाम परेशानियों के बावजूद अमृता देवी ने हिम्मत नहीं हारी. उन्होंने करीब 30 हजार रुपये की अपनी निजी पूंजी लगाकर 50 बैग से ऑयस्टर मशरूम का उत्पादन शुरू किया. खास बात यह रही कि उन्होंने न तो किसी बैंक से कर्ज लिया और न ही किसी निजी लोन पर निर्भर रहीं. पति अरुण कुमार महतो की सीमित कमाई के सहारे उन्होंने धीरे-धीरे अपने काम को आगे बढ़ाया. लगातार मेहनत, अनुभव और सीखने की लगन का नतीजा यह हुआ कि आज वे ऑयस्टर मशरूम के साथ-साथ बटन मशरूम का भी सफलतापूर्वक उत्पादन कर रही हैं.

आज अमृता देवी का नाम स्थानीय बाजार में अच्छी पहचान बना चुका है. कभी-कभी एक ही दिन में एक क्विंटल तक मशरूम की बिक्री हो जाती है, हालांकि यह पूरी तरह से मौसम और बाजार की मांग पर निर्भर करता है. फिलहाल वे होलसेल में करीब 200 रुपये प्रति किलो की दर से मशरूम बेच रही हैं, जबकि जून-जुलाई के मौसम में बटन मशरूम की कीमत 300 रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाती है. इससे उन्हें अच्छी आमदनी हो रही है और परिवार की आर्थिक स्थिति पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो चुकी है. बच्चों की पढ़ाई, घर के खर्च और भविष्य की योजनाएं अब बेहतर ढंग से पूरी हो पा रही हैं.

सरकारी सहायता के बारे में अमृता देवी बताती हैं कि अभी तक उन्हें किसी तरह की सीधी आर्थिक मदद नहीं मिली है, लेकिन जीविका समूह से मिली ट्रेनिंग ने उन्हें आत्मविश्वास और तकनीकी जानकारी जरूर दी है. उन्होंने बताया कि सरकार की ओर से प्रस्तावित 80 हजार रुपये के लोन की प्रक्रिया ऑनलाइन शुरू होनी है, लेकिन फिलहाल यह सुविधा लागू नहीं हो पाई है. इसके बावजूद अमृता देवी का हौसला कम नहीं हुआ है. उनका कहना है कि यदि सरकारी सहयोग मिल जाए तो वे बड़े स्तर पर मशरूम उत्पादन शुरू करना चाहती हैं और गांव की अन्य महिलाओं को भी रोजगार देना चाहती हैं. अमृता देवी की यह सफलता की कहानी उन सभी महिलाओं के लिए प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के कारण अपने सपनों को अधूरा छोड़ देती हैं.

लेखक के बारे में

अमिता किशोर

न्यूज़18इंडिया में कार्यरत हैं. आजतक से रिपोर्टर के तौर पर करियर की शुरुआत फिर सहारा समय, ज़ी मीडिया, न्यूज नेशन और टाइम्स इंटरनेट होते हुए नेटवर्क 18 से जुड़ी. टीवी और डिजिटल न्यूज़ दोनों विधाओं में काम करने क…और पढ़ें

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