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Bihar Chunav: नीतीश कुमार ने पिछले दो दशकों में बार-बार महिलाओं को केंद्र में रखकर राजनीति की है. बात चाहे नीतीश कुमार के शुरुआती कार्यकाल के मुख्यमंत्री बालिका साइकिल-पोशाक योजना की हो या शराबबंदी का मुद्दा हो. जीविका दीदी कार्यक्रम से लेकर पंचायतों में 50% आरक्षण या अब आर्थिक मदद वाली स्कीम- नीतीश की छवि महिलाओं के हितैषी नेता की रही है.
पटना. बिहार विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान अगले हफ्ते हो जाएगा. वहीं इसी बीच एक बार फिर महिलाओं का वोट बैंक चुनावी बहस के केंद्र में आ गया है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की महत्वाकांक्षी योजना “मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना” के तहत लाखों महिलाओं को 10 हज़ार रुपये की आर्थिक मदद मिल रही है. आज मुख्यमंत्री महिला स्वरोजगार की दूसरी किस्त भी 25 लाख महिलाओं के खाते में भेज दी गयी है. ऐसे में सवाल यह है कि क्या यह स्कीम NDA के लिए गेमचेंजर साबित होगी या विपक्ष इसे भी ‘चुनावी जुमला’ कहकर जनता के सामने पलटवार करने में सफल रहेगा?
बिहार में महिला वोट बैंक का समीकरण
बिहार में कुल मतदाताओं का लगभग 48 प्रतिशत हिस्सा महिलाएं हैं. पिछली बार 2020 विधानसभा चुनाव में महिला वोटिंग प्रतिशत पुरुषों से ज़्यादा रहा था. 2020 में 59.7% महिलाएं वोट डालने पहुंचीं, जबकि पुरुषों का आंकड़ा 54.6% रहा. यही नहीं, कई सीटों पर महिलाओं के वोट ने हार-जीत का अंतर तय किया था. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2025 में भी महिला मतदाता “किंगमेकर” की भूमिका निभा सकती हैं.
महिलाओं का मूड क्या कहता है?
नवादा और जमुई की महिलाओं से न्यूज़18 टीम ने बातचीत की. नवादा की रेखा देवी के अनुसार “नीतीश जी ने हमें सम्मान दिया है, पैसा मिला तो हमलोग को मजबूती मिलेगी. नीतीश जी शराबबंदी कानून लाकर महिलाओं की बड़ी बात मानी है. वहीं जमुई की ”संगीता कुमारी कहती हैं- “मदद अच्छी है, लेकिन बच्चों के लिए नौकरी चाहिए, पढ़ाई का खर्च मुश्किल से निकलता है.”हालांकि नीतीश जी ने महिलाओं के लिए आरक्षण से लेकर कई योजनाएं लेकर आए हैं, जिसका बिहार की आधी आबादी को मिला. यानी महिलाओं में राहत और उम्मीद दोनों है, लेकिन असली सवाल रोजगार और स्थायी आय का ही है.
चुनावी असर: गेमचेंजर या सीमित दायरा?
वरिष्ठ पत्रकार अरुण कुमार पांडेय का कहना है कि बिहार 2 करोड़ 70 लाख परिवार हैं. अब तक एक करोड़ महिला को 10000 रुपये की राशि दी गयी. वहीं 6 महीने के बाद 2 लाख रुपये तक की राशि दी जाएगी. ऐसे में इसलिए यह योजना गेमचेंजर होगा. अरुण पांडेय का मानना है कि यह योजना उन इलाकों में ज्यादा असर डालेगी जहां महिलाएं स्वरोज़गार या छोटे काम से जुड़ी हुई हैं. लेकिन शहरी और युवतियों के बीच इसका असर सीमित रह सकता है. यदि महिलाएं एकमुश्त आर्थिक मदद को बड़ा समर्थन मानती हैं, तो NDA को सीधा फायदा हो सकता है। लेकिन अगर रोजगार और सुरक्षा जैसे बड़े मुद्दे हावी रहे, तो विपक्ष को इसे “नकली राहत” साबित करने का मौका मिल जाएगा.
विपक्ष का पलटवार
राजद और कांग्रेस का दावा है कि यह सिर्फ चुनावी स्टंट है. तेजस्वी यादव बार-बार कह रहे हैं कि “महिलाओं को 10 हज़ार देकर सरकार जिम्मेदारी से बच नहीं सकती. असली रोजगार कहां है?”प्रशांत किशोर भी इसे “घोषणाओं की राजनीति” बताते हुए कह चुके हैं कि “लोगों को रोज़गार चाहिए, फ्री स्कीम नहीं.” विपक्ष यह नैरेटिव बनाने में जुटा है कि महिलाओं के वोट NDA के पाले में न झुकें. बिहार की राजनीति में महिलाएं हमेशा निर्णायक साबित हुई हैं. नीतीश कुमार की 10 हज़ार वाली योजना निश्चित रूप से महिला मतदाताओं को लुभाने की कोशिश है. लेकिन, क्या यह योजना NDA को सत्ता में वापसी दिलाएगी, या फिर विपक्ष इसे बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार के मुद्दे के सामने फीका कर देगा- यह 2025 के चुनावी नतीजे ही तय करेंगे.
एक मल्टीमीडिया पत्रकार को मुख्यधारा के मीडिया उद्योग में 14 साल से अधिक का अनुभव है। वर्तमान में News18 हिंदी वेबसाइट के लिए नेटवर्क 18 मीडिया एंड इन्वेस्टमेंट लिमिटेड के साथ काम करना मुख्य उप संपादक के रूप में है। वह …और पढ़ें
एक मल्टीमीडिया पत्रकार को मुख्यधारा के मीडिया उद्योग में 14 साल से अधिक का अनुभव है। वर्तमान में News18 हिंदी वेबसाइट के लिए नेटवर्क 18 मीडिया एंड इन्वेस्टमेंट लिमिटेड के साथ काम करना मुख्य उप संपादक के रूप में है। वह … और पढ़ें