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असमर्थ महिला कल्याण ट्रस्ट के संस्थापक पंडित रामनिवास अहिरका ने नरवाना रोड स्थित संस्था कार्यालय में गायत्री यज्ञ के बाद अपने विचार रखे। उन्होंने कहा िक मन-मस्तिष्क परमात्मा के ध्यान का केंद्र है लेकिन सभी का मन शुद्ध हो, यह जरूरी नहीं। जैसे बादल छा जाने पर सूर्य का प्रकाश मंद हो जाता है, वैसे ही अशुद्ध मन सच्चे मार्ग का बोध नहीं करा सकता। इससे जीवन दीन हीन हो जाता है। उन्होंने कहा िक हमारे सुख-दुख का कारण केवल कर्म नहीं, विचार भी हैं।
सात्विक सोच से व्यक्ति दुखों से निकलकर सुखों की ओर बढ़ सकता है। जब तक मन में विषय विकारों के बादल छाए रहते हैं, तब तक किसी भी सुख की अनुभूति नहीं हो सकती। मन को विकारों से मुक्त कर जीवन को शतपथ पर चलाना ही सुखों का आधार है। उन्होंने कहा िक मन को सात्विक बनाने में परमात्मा का भजन सबसे बड़ा साधन है।
लेकिन कुसंग का त्याग, सत्संग, स्वाध्याय, सदाचार, सात्विक भोजन, प्राणियों की अवैध हिंसा से बचना और निष्काम सेवा भी उतने ही जरूरी हैं। इन सबको अपनाने के लिए त्याग जरूरी है। व्यवहार में लोग प्राप्ति को श्रेष्ठ मानते हैं लेकिन त्याग और प्राप्ति एक-दूसरे के पूरक हैं। न त्याग बिना प्राप्ति संभव है न प्राप्ति बिना त्याग। यह मन की शुद्धि से समझने का विषय है कि कब किसकी आवश्यकता है।