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एनआरसीएल ने विकसित की लीची की नई उन्नत किस्में, खेती से होगी दोगुनी आमदनी

एनआरसीएल ने विकसित की लीची की नई उन्नत किस्में, खेती से होगी दोगुनी आमदनी
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मुजफ्फरपुर अपने लीची उत्पादन के लिए अब भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में जाना जाता है. राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र ने गंडकी योगिता, गंडकी संपदा और गंडकी लालीमा जैसी नई लीची किस्में विकसित की जो बेहतर उपज, गुणवत्ता और किसानों की आय बढ़ाने में सहायक हैं.

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अनुसंधान केंद्र

मुजफ्फरपुर. मुजफ्फरपुर स्थित राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र (एनआरसीएल) ने लीची उत्पादक किसानों के लिए बड़ी सौगात दी है.  केंद्र द्वारा विकसित लीची के कई नए और उन्नत प्रभेद अब खेती के लिए उपलब्ध कराए जा रहे हैं, जो न केवल बेहतर उपज और गुणवत्ता देते हैं, बल्कि फल टूटने (क्रैकिंग) की समस्या से भी काफी हद तक राहत दिलाते हैं. इन नई किस्मों में गंडकी योगिता, गंडकी संपदा और गंडकी लालीमा प्रमुख हैं. विशेषज्ञों के अनुसार, इन किस्मों के आने से लीची के मौसम को लंबा करने और किसानों की आमदनी बढ़ाने में मदद मिलेगी.

जलवायु परिवर्तन से नहीं पड़ेगा असर
एनआरसीएल के वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन और अनियमित मौसम के कारण पारंपरिक किस्मों में फल फटने और उत्पादन घटने की समस्या लगातार बढ़ रही थी. इसे ध्यान में रखते हुए कई वर्षों के शोध के बाद इन उन्नत प्रभेदों को विकसित किया गया है.

गंडकी योगिता लीची काफी लाभदायक
गंडकी योगिता लीची उत्पादकों के लिए खास तौर पर लाभकारी मानी जा रही है. यह किस्म लोकप्रिय शाही लीची की तुलना में 7 से 10 दिन पहले पक जाती है. इससे किसानों को बाजार में जल्दी प्रवेश का मौका मिलता है और शुरुआती सीजन में बेहतर दाम मिलते हैं.  साथ ही, यह मौसम के अचानक बदलाव से होने वाले नुकसान को भी कम करती है.

85 प्रतिशत गूदा रहने से बाजार में अधिक मांग
वहीं गंडकी संपदा देर से पकने वाली किस्म है, जो बड़े आकार और आकर्षक फल के लिए जानी जा रही है. इसका औसत फल वजन 35 से 42 ग्राम तक होता है. इस किस्म की सबसे बड़ी विशेषता फल फटने के प्रति इसकी प्रतिरोधकता है. इसके अलावा, इसमें गूदे की मात्रा 80 से 85 प्रतिशत तक होती है, जिससे बाजार में इसकी मांग अधिक रहने की संभावना है.

एक पेड़ 130 से 140 किलो उपज
गंडकी लालीमा भी देर से पकने वाली उन्नत किस्म है. इसमें गूदा काफी मीठा होता है, जिसका टीएसएस 18 से 19 डिग्री ब्रिक्स तक पाया गया है. इसकी खुशबू और स्वाद इसे उपभोक्ताओं के बीच खास बनाते हैं. वैज्ञानिकों के अनुसार, अनुकूल परिस्थितियों में इस किस्म से प्रति पेड़ 130 से 140 किलोग्राम तक उत्पादन संभव है.

एनआरसीएल के अधिकारियों का कहना है कि इन नई किस्मों के विस्तार से बिहार ही नहीं, बल्कि देश के अन्य लीची उत्पादक राज्यों के किसानों को भी लाभ मिलेगा. इससे लीची उत्पादन अधिक स्थिर होगा, निर्यात की संभावनाएं बढ़ेंगी और किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि होगी.

घरकृषि

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